श्री गुरू ग्रंथ साहिब दर्पण । टीकाकार: प्रोफैसर साहिब सिंह । अनुवादक भुपिन्दर सिंह भाईख़ेल

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गोंड ॥ मोहि लागती तालाबेली ॥ बछरे बिनु गाइ अकेली ॥१॥

पद्अर्थ: मोहि = मुझे। तालाबेली = तिलमिली, तिलमिलाहट। गाइ = गाय।1।

अर्थ: जैसे बछड़े से विछुड़ के अकेली गाय (घबराती) है, वैसे ही मुझे (भी प्रभु से विछुड़ के) तिलमिलाहट होती है।1।

पानीआ बिनु मीनु तलफै ॥ ऐसे राम नामा बिनु बापुरो नामा ॥१॥ रहाउ॥

पद्अर्थ: मीनु = मछली। तलफै = तड़पती है। बापरो = बेचारा, घबराया हुआ।1। रहाउ।

अर्थ: जैसे पानी के बिना मछली तड़फती है, वैसे ही मैं नामदेव प्रभु के नाम के बिना घबराता हूँ।1। रहाउ।

जैसे गाइ का बाछा छूटला ॥ थन चोखता माखनु घूटला ॥२॥

पद्अर्थ: छूटला = खूँटे से खुल जाता है। बाछा = बछड़ा। चोखता = चूँघता। घूटला = घूँट भरता है।2।

अर्थ: जैसे (जब) गाय का बछड़ा खूँटे से खुल जाता है तो (गाय के) थन चूँघता है, और मक्खन के घूँट भरता है,।2।

नामदेउ नाराइनु पाइआ ॥ गुरु भेटत अलखु लखाइआ ॥३॥

पद्अर्थ: भेटत = मिलते हुए ही। अलखु = जो लखा ना जा सके, जिसके गुणों का थाह नहीं पाया जा सकता।3।

अर्थ: वैसे ही जब मुझे नामदेव को सतिगुरु मिला, मुझे अलख प्रभु की सूझ पड़ गई, मुझे ईश्वर मिल गया; और ।3।

जैसे बिखै हेत पर नारी ॥ ऐसे नामे प्रीति मुरारी ॥४॥

पद्अर्थ: बिखै हेत = विषय विकारों की खातिर।4।

अर्थ: जैसे (विषयी व्यक्ति को) विषय पूर्ति के लिए पराई नारि से प्यार होता है, मुझ नामे को प्रभु से प्यार है।4।

जैसे तापते निरमल घामा ॥ तैसे राम नामा बिनु बापुरो नामा ॥५॥४॥

पद्अर्थ: तपते = तपते हैं। निरमल = साफ। घामा = धूप, गर्मी।5।

अर्थ: प्रभु के नाम से विछुड़ के मैं नामदेव इस तरह घबराता हूँ, जैसे चमकती धूप में (जीव-जंतु) तपते-तड़पते हैं।5।4।

भाव: प्रीत का स्वरूप- वियोग असहि होता है।

रागु गोंड बाणी नामदेउ जीउ की घरु २    ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

हरि हरि करत मिटे सभि भरमा ॥ हरि को नामु लै ऊतम धरमा ॥ हरि हरि करत जाति कुल हरी ॥ सो हरि अंधुले की लाकरी ॥१॥

पद्अर्थ: हरि हरि करत = प्रभु का नाम स्मरण करते हुए। भरमा = भटकना। लै नामु = नाम स्मरण कर। ऊतम = सबसे श्रेष्ठ। हरी = नाश हो जाती है। लाकरी = लकड़ी, डंगोरी, आसरा।1।

अर्थ: हरि-नाम स्मरण करने से सभ भटकनें दूर हो जाती हैं; हे भाई! नाम स्मरण कर, यही है सबसे अच्छा धर्म। नाम स्मरण करने से (नीच और ऊँची) जाति कुल का भेद-भाव दूर हो जाता है। वह हरि-नाम ही मुझ अंधे का आसरा है।1।

हरए नमसते हरए नमह ॥ हरि हरि करत नही दुखु जमह ॥१॥ रहाउ॥

पद्अर्थ: हरए = हरि को (देखें मेरी ‘सुखमनी सटीक’ में शब्द ‘गुरऐ’ की व्याख्या)।1। रहाउ।

अर्थ: मेरा उस परमात्मा को नमस्कार है, जिसका स्मरण करने से जमों का दुख नहीं रहता।1। रहाउ।

हरि हरनाकस हरे परान ॥ अजैमल कीओ बैकुंठहि थान ॥ सूआ पड़ावत गनिका तरी ॥ सो हरि नैनहु की पूतरी ॥२॥

पद्अर्थ: हरे परान = प्राण हरे, जान ले ली, मार दिया। थान = जगह। सूआ = तोता। गनिका = वेश्वा। पूतरी = पुतली।2।

अर्थ: प्रभु ने हरणाक्षस (दैत्य) को मारा, अजामल पापी को बैकुंठ में जगह दी। उस हरि का नाम तोते को पढ़ाते हुए वेश्या भी विकारों से हट गई; वही प्रभु मेरी आँखों की पुतली है।2।

हरि हरि करत पूतना तरी ॥ बाल घातनी कपटहि भरी ॥ सिमरन द्रोपद सुत उधरी ॥ गऊतम सती सिला निसतरी ॥३॥

पद्अर्थ: पूतना = उस दाई का नाम था जिसको कंस ने गोकुल में कृष्ण जी को मारने के लिए भेजा था; ये स्तनों पर जहर लगा के गई, पर कृष्ण जी ने स्तन मुँह में ले कर इसके प्राण खींच लिए; आखिर मुक्ति भी दे दी। घातनी = मारने वाली। कपट = धोखा, फरेब। द्रोपद सुत = राजा द्रोपद की बेटी, द्रोपदी। सती = नेक स्त्री, जो अपने पति के श्राप से सिला बन गई थी, श्री राम चंद्र जी ने इसको मुक्त किया था।3।

अर्थ: बच्चों को मरने वाली और कपट से भरी हुई पूतना दाई का भी उद्धार हो गया, जब उसने हरि-नाम स्मरण किया; नाम-जपने की इनायत से ही द्रोपदी (निरादरी से) बची थी, गौतम की नेक स्त्री का पार उतारा हुआ था, जो (गौतम के श्राप से) शिला बन गई थी।3।

केसी कंस मथनु जिनि कीआ ॥ जीअ दानु काली कउ दीआ ॥ प्रणवै नामा ऐसो हरी ॥ जासु जपत भै अपदा टरी ॥४॥१॥५॥

पद्अर्थ: केसी = वह दैंत जिसको कंस ने कृष्ण जी के मारने को लिए गोकुल भेजा था। मथनु = नाश। जिनि = जिसने। काली = एक नाग था जिसे कृष्ण जी ने जमुना से निकाला था। जीअ दानु = प्राण क्षमा करने। प्रणवै = विनती करता है। जासु = जिसको। अपदा = मुसीबत। टरी = टल जाती है।4।

अर्थ: उसी प्रभु ने केसी व कंस का नाश किया था, और काली नाग की जान बख्श दी थी। नामदेव विनती करता है - प्रभु ऐसा (कृपालु बख्शिंद) है कि उसका नाम स्मरण करने से सब डर और मुसीबतें टल जाती हैं।4।1।5।

भाव: प्रभु का स्मरण सभी धर्मों से श्रेष्ठ धर्म है। नाम-जपने की इनायत से सब मुसीबतें टल जाती हैं, बड़े-बड़े विकारी भी विकारों से हट जाते हैं।

गोंड ॥ भैरउ भूत सीतला धावै ॥ खर बाहनु उहु छारु उडावै ॥१॥

पद्अर्थ: भैरउ = एक जती का नाम था, सवारी काले कुत्ते की बताई जाती है। शिव की आठ भयानक शक्लों में से एक भैरव की है। इसका मन्दिर जम्मू के आगे दुर्गा के मन्दिर के ऊपर दो मील पर बना हुआ है। सीतला = चेचक (small pox) की देवी, इसकी सवारी गधे की है। खर = गधा। खर बाहनु = गधे की सवारी करने वाला। छार = राख।1।

अर्थ: जो मनुष्य भैरव की ओर जाता है (भाव, जो भैरव की आराधना करता है) वह (ज्यादा से ज्यादा भैरव जैसा ही) भूत बन जाता है। जो सीतला को आराधता है वह (सीतला की ही तरह) गधे की सवारी करता है और (गधे के साथ) राख ही उड़ाता है।1।

हउ तउ एकु रमईआ लैहउ ॥ आन देव बदलावनि दैहउ ॥१॥ रहाउ॥

पद्अर्थ: तउ = तब। रमईआ = सुंदर राम। लै हउ = लाऊँगा। आन = और। बदलावनि = बदले में। दै हउ = दे दूंगा।1। रहाउ।

अर्थ: (हे पण्डित!) मैं तो एक सुंदर राम का नाम ही लूँगा, (तुम्हारे) बाकी सारे देवताओं को उस नाम के बदले में दे दूँगा, (अर्थात, प्रभु-नाम के मुकाबले में मुझे तुम्हारे किसी भी देवते की आवश्यक्ता नहीं है)।1। रहाउ।

सिव सिव करते जो नरु धिआवै ॥ बरद चढे डउरू ढमकावै ॥२॥

पद्अर्थ: बरद = बैल (ये शिव जी की सवारी है)। डउरू = डमरू।2।

अर्थ: जो मनुष्य शिव का नाम जपता है वह (ज्यादा से ज्यादा जो कुछ हासिल कर सकता है वह ये है कि शिव का रूप ले के, शिव की सवारी) बैल के ऊपर चढ़ता है और (शिव की ही तरह) डमरू बजाता है।2।

महा माई की पूजा करै ॥ नर सै नारि होइ अउतरै ॥३॥

पद्अर्थ: महा = बड़ी। महा माई = बड़ी माँ, पार्वती। सै = से। होइ = बना के। अउतरै = पैदा होता है।3।

अर्थ: जो मनुष्य पार्वती की पूजा करता है वह मनुष्य नर से नारी हो के जन्म लेता है (क्योंकि पूजा करने वाला अपने पूज्य का रूप ही बन सकता है)।3।

तू कहीअत ही आदि भवानी ॥ मुकति की बरीआ कहा छपानी ॥४॥

पद्अर्थ: कहीअत = कही जाती है। भवानी = दुर्गा देवी। बरीआ = बारी। छपानी = छुप जाती है।4।

अर्थ: हे भवानी! तू सबका आदि कहलवाती है, पर (अपने भक्तों को) मुक्ति देने के समय तू भी, पता नहीं कहाँ छुपी रहती है (भाव, मुक्ति भवानी के पास भी नहीं है)।4।

गुरमति राम नाम गहु मीता ॥ प्रणवै नामा इउ कहै गीता ॥५॥२॥६॥

पद्अर्थ: गहु = पकड़, आसरा ले। मीता = हे मित्र पंडित! इउ = इसी तरह ही।5।

अर्थ: सो, नामदेव विनती करता है: हे मित्र (पण्डित!) सतिगुरु की शिक्षा ले के परमात्मा के नाम की ओट ले, (तुम्हारी धर्म-पुस्तक) गीता भी यही उपदेश देती है।5।2।6।

शब्द का भाव: पूजा करके ज्यादा से ज्यादा अपने पूज्य का रूप ही बन सकता है। संसार-समुंदर से मुक्ति दिलानी किसी देवी-देवते के हाथ में नहीं; इसलिए परमात्मा का नाम ही स्मरणा चाहिए, प्रभु ही मुक्तिदाता है।

नोट: आखिरी पद में संबोधन करके जिस ‘मीत’ को नामदेव जी इस शब्द के द्वारा भैरव, शिव, महामाई आदि की पूजा करने से रोकते हैं वह कोई पंडित प्रतीत होता है, क्योंकि उसका ध्यान उसकी अपनी ही पुस्तक ‘गीता’ की ओर भी दिलाते हैं।

बिलावलु गोंड ॥ आजु नामे बीठलु देखिआ मूरख को समझाऊ रे ॥ रहाउ॥

पद्अर्थ: आजु = आज, अब, इसी जनम में। बीठलु = (संस्कृत: विष्ठल One situated at a distance. वि = परे, दूर। स्थल = खड़ा हुआ) वह जो माया के प्रभाव से परे है। रे = हे पांडे! समझाऊ = मैं समझाऊँ। रहाउ।

अर्थ: हे पांडे! मैंने तो इसी जनम में परमात्मा के दर्शन कर लिए हैं (पर, तू मूर्ख ही रहा, तुझे दर्शन नहीं हुए; आ) मैं (तुझ) मूर्ख को समझाऊँ (कि तुझे दर्शन क्यों नहीं होते)।1। रहाउ।

पांडे तुमरी गाइत्री लोधे का खेतु खाती थी ॥ लै करि ठेगा टगरी तोरी लांगत लांगत जाती थी ॥१॥

पद्अर्थ: तुमरी गायत्री = जिसको तुम गायत्री कहते हो और जिसके बाबत श्रद्धा-हीन कहानी भी बना रखी है। गाइत्री = (संस्कृत: गायत्री) = एक बड़ा पवित्र मंत्र जिसका पाठ हरेक ब्राहमण के लिए सवेरे शाम करना आवश्यक है। वह मंत्र इस तरह है: तत्सवितुर्वरेण्य भर्गो देवस्य धीमही धयो यो न: प्रचोदयात्। लोधा = जाटों की जाति का नाम है। ठेगा = डंडा, सोटा। लांगत = लंगड़ा लंगड़ा के।1।

अर्थ: हे पांडे! (पहली बात तो ये कि जिस गायत्री का तू पाठ करता है उस पर तेरी श्रद्धा नहीं बन सकती, क्योंकि) तेरी गायत्री (वह है जिसके बारे में तू खुद ही कहता है कि एक बार श्राप के कारण ये गाय की जून में आ के) एक लोधे जाट के खेत को चरने चली गई, उसने डंडा मार के लात तोड़ दी तब (से बेचारी) लंगड़ा-लंगड़ा के चलने लगी।1।

पांडे तुमरा महादेउ धउले बलद चड़िआ आवतु देखिआ था ॥ मोदी के घर खाणा पाका वा का लड़का मारिआ था ॥२॥

पद्अर्थ: महादेव = शिव। मउले = सफेद। मोदी = भण्डारी। वा का = उसका।2।

अर्थ: हे पांडे! (फिर तू जिस शिव की आराधना करता है उसे ही बड़ा क्रोधी समझता है और कहता है कि गुस्से में आ के वह श्राप दे देता है, भस्म कर देता है। ऐसे शिव से तू प्यार कैसे कर सकता है?) तेरा शिव (तो वह है जिसके बारे में तू कहता है) किसी भण्डारी के घर में उसके लिए भोजन तैयार हुआ, शिव को सफेद बैल पर चढ़ा हुआ जाता देखा, (भाव, तू बताता है कि शिव जी सफेद बैल की सवारी करते थे) (पर, शायद वह भोजन पसंद नहीं आया, शिव जी ने श्राप दे के) उसका लड़का मार दिया।2।

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Sri Guru Granth Darpan, by Professor Sahib Singh